हज़रत खालिद बिन वलीद रज़ि0 इस्लाम की पहली आर्मी के अज़ीम सिपहसालार रहे हैं उस ज़माने की दो सुपर पावर बाज़नतिनी एम्पायर (क़ैसर हरक्युलिस) और शहंशाहे फारस (क़िसरा उर्दशेर) की अज़ीम फौजों को जिन्होंने धूल चटाई और दोनों ग्रेट एम्पायर्स के परखच्चे उड़ा दिए। ये हज़रत खालिद बिन वलीद ही थे जिन्होंने जंग ए यरमूक में रोमन इसाईयों को फैसलाकुन शिकस्त दी जिसके नतीजे में बैतुल मुकद्दस पके फल की तरह मुसलमानों की झोली में आन गिरा था।
इस बहादुरी और शुजाअत का ज़हूर पहली बार जंगे मौता में हुआ था, जंगे मौता शामे अरब (सीरिया) इलाके में आबाद कबीला ग़ुस्सान से हुई थी, कबीला ग़ुस्सान के सरदार ने रसूल अल्लाह मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का दावती खत पंहुचाने वाले सफीर का कत्ल कर दिया था, सफीर का कत्ल इन्सानियत के खिलाफ बहुत बड़ा जुर्म माना जाता है और जंग का ऐलान समझा जाता है। कबीला ग़ुस्सान एक ईसाई कबीला था, रोमन क़ैसर हरक्युलिस का बाज़ गुज़ार था जैसे आज चीन और नार्थ कोरिया हैं। जंगे मौता में ईसाइ फौज की तादाद तीन लाख थी और मुसलमानों की तादाद सिर्फ तीन हज़ार, इस जंग में मुसलमानों के एक के बाद एक लगातार तीन सिपहसालार शहीद हुए थे जो पहले ही हुजूर अलै0 ने तय कर दिए थे, एक तरह से हुजूर अलै0 ने तीनो सिपहसालारों को (जाफर बिन अबू तालिब रज़ि0, अब्दुल्ला बिन रवा रज़ि0, ज़ैद बिन हारिस रज़ि0) शहादत की पेशगी खुशखबरी सुना दी थी। बहरहाल जब तीनों सिपहसालार शहीद हो गए तो हज़रत खालिद बिन वलीद ने खुद आगे बढ़कर फौज की कमान संभाल ली, हालांकि जंगे मौता में फतह नहीं हुई थी मगर शिकस्त भी नहीं हुई थी, इस जंग में इस्लामी फौज का ज़िन्दा बचकर आ जाना ही बहुत बड़ी फतह थी। हज़रत खालिद बिन वलीद ने बड़ी होशियारी से मैदाने ज़ंग से इस्लामी फौज को बाहर निकाला था, इस जंग में बारह मुस्लिम फौजी शहीद हुए और ईसाई मरने वाले फौजी कई हज़ार थे। इसी बहादुरी और शुजाअत को खिराजे तहसीन पेश करते हुए रसूल अल्लाह ने हज़रत खालिद बिन वलीद को "सैफुल्लाह" का खिताब अता फरमाया था।
आजकल जिसे सर्जिकल स्ट्राइक कहा जाता है उसके ईजादकर्ता हज़रत खालिद बिन वलीद ही थे यह उनका खास तरीकाए जंग था जिसे उस ज़माने में शबखून कहा जाता था। हज़रत खालिद बिन वलीद ने ५०० घुड़सवारों की एक टुकड़ी बनाई थी जिसका काम ही यही होता था कि हमला करो और पिछे हट जाओ, फिर हमला करो और हट जाओ, इस तरह खालिद बिन वलीद दुश्मन की आधी ताक़त बरबाद कर दिया करते थे। इसी तरीकेकार की बदौलत खालिद बिन वलीद ने उस वक्त की सुपर पावर रोम और फारस को फतेह किया और इस्लाम का परचम लहराया। बाद में मिल्लते इस्लामिया की सभी फौजों में यह घुड़सवार रिसाला अहम शोबे की हैसियत से मौजूद रहा, बाद के बहुत से इस्लामी सिपहसालारों ने हज़रत खालिद बिन वलीद के नक्शेकदम पर चलते हुए तारीख में सुनहरे पन्ने दर्ज कराये। सलाहुद्दीन अय्यूबी रह0, मूसा बिन नसीर रह0, तारिक़ बिन ज़ियाद रह0 और मुहम्मद बिन क़सिम रह0 इस फेहरिस्त के नायाब नगीने थे। नेपोलियन बोनापार्ट के मुताबिक खुद वो भी हज़रत खालिद बिन वलीद के "फन्ने हरब व जरब" और उनके जंगी स्टाईल को स्टडी किया करता था और उन्हीं की तर्ज़ पर अपनी आर्मी को ट्रेनिंग दिलाया करता था।
अपने आखिरी वक्त मे हज़रत खालिद ने अपने साथी को बुला कर कहा बताओ मेरे जिस्म का कौन सा हिस्सा ऐसा है जहाँ ज़ख्म नहीं फिर मुझे शहादत क्यूँ नहीं मिली? साथी ने जवाब दिया आपको अल्लाह के रसूल ने सैफुल्लाह कहा यानी अल्लाह की तलवार, भला अल्लाह की तलवार कैसे टूट सकती है। अमीरुल मोमिनीन हज़रत उमर फारूक रज़ि0 के दौरे खिलाफत मे अरब के लोगों को सिपाहियों की मय्यत पर रोने की इजाज़त नहीं थी जब खालिद बिन वलीद दुनिया से रुखसत हुए तो हज़रत उमर ने कहा आज इजाज़त है आज किसी को रोने से नहीं रोका जाएगा।
--खालिद बिन वलीद का पैग़ाम
उम्मत ए मुस्लिमा के नाम--
मौत लिखी ना हो तो मौत खुद ज़िन्दगी की हिफाज़त करती है जब मौत मुकद्दर हो तो ज़िन्दगी दौड़ती हुई मौत से लिपट जाती है ज़िन्दगी से ज़्यादा कोई जी नही सकता और मौत से पहले कोई मर नही सकता। दुनिया के बुज़दिलों को मेरा ये पैग़ाम पहुंचा दो अगर मैदाने जिहाद में मौत होती तो इस तरह खालिद बिन वलीद को बिस्तर पर मौत न आती।
एक बार रोमन सिपहसालार ने हज़रत खालिद से पूछा आखिर आप इतनी कलील तादाद में होकर भी हमेशा फतहयाब कैसे रहते हैं? हज़रत खालिद ने जवाब दिया.. जितनी तुम्हें ज़िन्दगी से मुहब्बत है उससे कहीं ज़्यादा हमें शहादत अज़ीज़ है।
#अज़्मत_ए_सहाबा
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