हम सब अपनी बेटियों की परवरिश बड़े नाज से करते हैं । स्व्भविक रूप से हर पिता का लगाव बेटों के निस्बत बेटियों की ओर सहानुभूति अधिक होती है ।
जैसे जैसे बेटे और बेटियां बड़े होते जाते हैं, बेटियों के प्रति प्रेम और जिम्मेदारी का एहसास बढ़ता जाता है ।
बेटे बड़ा होते होते जैसे जैसे आजादी का एहसास बढ़ता है, उसकी नाफरमानी बढ़ती जाती है । दूसरी ओर बेटियां मतभेद के बावजूद उतनी शिद्दत से इख़्तिलाफ़ व्यक्त नहीं करती जितनी के लड़के करते हैं । इस लिए बढ़ती आयू के साथ लड़कियों के प्रति मांबाप का लगाव बढ़ जाता है ।
कोई चाहे जितना भी लाड प्यार से बेटियों को पाले पिता के मन में यह एहसास तो होता ही है कि बेटियां पराया धन है । यह एक न एक दिन अपना घर मुकम्मल करने के लिए यह घर छोड़ कर चली जाएगी ।
दूसरी ओर बेटा जितना भी नाफ़रमान हो, उसका वंश उसी से चलना है ।
हम भी अपनी बेटियों की परवरिश कर रहे हैं । मेरा मानना है कि प्रतिस्पर्धा के इस युग में बेटियों को चूल्हे चक्की तक महदूद रखना उस पर जुल्म होगा । लड़कियां भी इतनी मजबूत हों जो हर तरह से जीवन के उतार चढ़ाव का सामना कर सके ।
परिवार की अहमियत, घर का रख रखाव, बड़ों का आदर, छोटों से शफ़क़त, किसी की चुगली या गीबत न करने का सबक(जो लड़कियों में आम बीमारी है), दीन की समझ के साथ इल्म और हुनर में भी माहिर हो ।
जरूरत पड़ने पर कलम उठा सके, जरूरत पड़ने पर हुनर आजमा सके, और जरूरत पड़ने पर तलवार भी उठा सके । यह मेरे नजदीक लड़कियों के लिए पूर्ण शिक्षा है ।
दुआ कीजिए हर बाप अपनी बेटियों को एक कामयाब लड़की बना सके ।
No comments:
Post a Comment