Wednesday, 27 December 2023

क़ुर्बानी_का_असल_मकसद_क्या_है

#क़ुर्बानी_का_असल_मकसद_क्या_है ? आप तमाम लोग से गुजारिश हैं कि इस पोस्ट को जरूर पढ़िए 🙏 क़ुर्बानी का लफ़्ज़ “क़ुर्ब” से बना है जिसका मतलब होता है ‘क़रीब होना’ महबूब जानवर को ज़िबह करने का मकसद अल्लाह से अपनी नजदीकियों को बढ़ाना मकसूद है इसलाम में बुनयादी तौर पर क़ुर्बानी हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के ज़माने से है जब उन्होंने अपने बेटे को क़ुर्बान करने की कोशिश की तो अल्लाह ने उनके बेटे के बदले एक जानवर की क़ुर्बानी ली तब से यह अपनी जान की क़ुर्बानी के निशान व सुन्नत के तौर पर हर साल दी जाती है क़ुरआन में उन बाप बेटों की बातचीत हजरत इब्राहीम ने कहा ऐ मेरे बेटे मैं ख़्वाब में तुम्हे क़ुर्बान करते हुए देखता हूँ तो तुम बताओ कि इस बारे में तुम्हारी क्या राय है ? बेटे इस्माइल ने जवाब दिया : अब्बू जान आप को जो हुक्म दिया जा रहा है उसे ज़रूर पूरा कीजिए, अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे। सूरह साफ्फात: 102 📙 सच है कि यह जवाब इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) के बेटे का ही हो सकता था। इसमें हज़रत इस्माइल (अलैहिस्सलाम) का कमाल ये ही नहीं कि क़ुर्बान होने के लिए तैयार हो गए बल्कि कमाल यह भी है कि अपनी अच्छाई को अल्लाह की तरफ मंसूब किया कि ”अगर अल्लाह ने चाहा तो आप मुझे सब्र करने वालों में पाएँगे 😊 हदीस में बयान हुई है अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से सहाबा ने पूछा कि ऐ अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) यह क़ुर्बानियां क्या हैं? आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने जवाब दिया कि तुम्हारे बाप इब्राहीम का तरीक़ा (सुन्नत) Reference मुसनद अहमद: 18797, इब्ने माजा: 3127 📖 क़ुरबानी में अपने जानवर की जान को अल्लाह के नाम ज़िबह करके बंदा इस जज़्बे का इज़हार कर रहा होता है कि मेरी जान भी अल्लाह की दी हुई है और जिस तरह आज मैं अपने जानवर की जान अल्लाह के लिए दे रहा हूँ अगर अल्लाह का हुक्म हुआ तो अपनी जान भी मैं देने के लिए तैयार हूँ। यही वह जज़्बा है जो क़ुरबानी की असल रूह है अगर हमारे अन्दर अपने जानवर की क़ुरबानी के साथ यह जज़्बा नहीं है तो यह असल क़ुरबानी नहीं है फ़िर यह ऐसे ही है जैसे रोज़ लोग अपने खाने के लिए जानवर ज़िबह करते हैं यही जज़्बा क़ुर्बानी का मक़सद है और यही जज़्बा अल्लाह को कबूल है अल्लाह कुरआन में फ़रमाता है कह दो कि मेरी नमाज़ मेरी क़ुरबानी ‘यानि’ मेरा जीना मेरा मरना अल्लाह के लिए है जो सब जहांनो का रब है। (कुरआन 6:162) क़ुर्बानी में कई हिकमते हैं लेकिन इस का सबसे अहम फलसफा यह है कि अल्लाह बन्दे के लिए सबसे बढ़ कर है। इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि इस्लाम में क़ुर्बानी एक इबादत की हेसियत रखती है और जैसा की आप जानते हैं कि इबादतें जितनी भी हैं वो सब बन्दे का अल्लाह से ताल्लुक़ का इज़हार होती हैं अल्लाह कुरआन में फ़रमाता है अल्लाह के पास ना तुम्हारी कुर्बानियों का गोश्त पहुँचता है और ना उनका खून, अल्लाह को सिर्फ़ तुम्हारा तक़वा पहुँचता है। (सूरह हज: 37) 📙 अल्लाह ने हजरत. इब्राहिम अ.स. से मुहब्बत की कुरबानी मांगी थी. और हजरत इब्राहिम अलैहि सलाम ने भी अल्लाह की बारगाह मे जो पेश की, वो मुहब्बत की ही कुरबानी थी क्या हमारी कुरबानी वही कुरबानी है, जो अल्लाह ने हमसे मांगी थी या सिर्फ़ हमारी कुरबानी सिर्फ़ दिखावे की बन कर रह गई है, कुरबानी यह नहीं की महंगे से महंगा जानवर या बड़े से बड़ा जानवर कुरबान किया जाए कुरबानी का असल मकसद मुहब्बत की कुरबानी का है, जब जानवर पे छुरी चलायें तो दिल मे ये नीयत रखें और अल्लाह से वादा करें की ऐ अल्लाह हम तेरी राह मे अपने माल की कुरबानी दे रहे हैं, ऐ अल्लाह हमने अपनी जिंदगी मे बहुत झूठ बोला है, बहुत से लोगों को धोखा दिया है ऐ अल्लाह हमें माफ कर आज हम उस झूठ और उस धोखे की कुरबानी दे रहे हैं ऐ अल्लाह हमने कम तौला है ,कम बेचा है, हम उस कम तौलने और कम बेचने की कुरबानी दे रहे है ऐ अल्लाह हमारे दिलों मे जो अपने भाईयों से कीना है, हसद है, जलन है, उस कीना को उस हसद को, उस जलन को अल्लाह आज हम कुरबान कर रहे हैं ऐ अल्लाह आज हम अपने माल की हिर्स ओ हवस को कुरबान कर रहे हैं ऐ अल्लाह आज हम अपनी बदनीयती, बेहयाई को कुरबान कर रहे हैं.. ऐ अल्लाह आज हम दुनिया की हर मुहब्बत को तेरी राह मे कुरबान कर रहे हैं ऐ अल्लाह हमारी कुरबानी को कबूल फरमा अगर इसी सोच के साथ हमने अपनी कुरबानी अपने अल्लाह के सामने पेश की तो यही वो कुरबानी है जो हमारा अल्लाह हमसे चाहता है और अगर यह सोच हमारी नहीं तो फिर वो कुरबानी, कुरबानी नहीं एक दिखावा होगी लोगों यकीन रखो अपना हर अमल अल्लाह को राज़ी के लिये करे दिखावा अल्लाह को पसंद नहीं है अल्लाह हमें कहने सुनने से ज्यादा अमल की तौफीक अता फरमाएं।। आमीन सुम्मा आमीन 🤲

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